इटावा समय में जहाँ सरकारी सेवाओं को अक्सर केवल वेतन और औपचारिकता से जोड़कर देखा जाता है वहीं डॉक्टर पीयूष तिवारी ने समाज के सामने एक अनूठी मिसाल पेश की है। वे एक ऐसे व्यक्तित्व के रूप में उभरकर सामने आए हैं जिनके लिए सरकारी पद केवल एक जिम्मेदारी नहीं बल्कि मानवता की सेवा का एक सशक्त माध्यम है। समाज का हर वर्ग उन्हें एक समान दृष्टि से देखता है क्योंकि उनका व्यवहार और उनकी कार्यशैली किसी भी भेदभाव से कोसों दूर है। अक्सर लोगों के मन में सरकारी तंत्र को लेकर कई शिकायतें होती हैं परंतु डॉक्टर पीयूष तिवारी ने अपने समर्पण से उन सभी धारणाओं को बदल दिया है और स्वयं को जन-जन का प्रिय बनाया है।
डॉक्टर पीयूष की चर्चा विशेष रूप से अंध विद्यालयों और सहायता केंद्रों में बहुत ही सम्मान के साथ की जाती है जहाँ उन्होंने अपने व्यक्तिगत प्रयासों और साधनों से एक बड़ा बदलाव लाने की कोशिश की है। उनके मित्रों और सहयोगियों के बीच उनकी पहचान एक ऐसे व्यक्ति की है जो संसाधनों की कमी के बावजूद मरीजों और जरूरतमंदों के लिए हमेशा तत्पर रहते हैं। जीवन में आगे बढ़ने के साथ-साथ जहाँ कुछ लोग उनकी आलोचना भी करते हैं वहीं डॉक्टर पीयूष इन सब बातों से बेअसर होकर अपने पथ पर अडिग हैं। उनका स्पष्ट मानना है कि जीवन की सार्थकता केवल उत्सव मनाने में नहीं बल्कि दूसरों के दुखों को दूर करने में निहित है।
अपने सेवा धर्म को सबसे ऊपर रखते हुए डॉक्टर पीयूष तिवारी का कहना है कि उनका जन्मदिवस कोई व्यक्तिगत जश्न का विषय नहीं है बल्कि यह दिन भी सेवा को ही समर्पित रहना चाहिए। वे इस बात पर जोर देते हैं कि चाहे वे आधिकारिक रूप से ड्यूटी पर तैनात हों या न हों उनके मन में हमेशा यही प्रयास रहता है कि कोई भी मरीज अपनी परेशानी लेकर आए तो उसे उचित समाधान और सांत्वना मिले। मरीजों के प्रति उनकी यह संवेदनशीलता और अपने कर्तव्य के प्रति ऐसी निष्ठा ही उन्हें समाज में एक विशेष स्थान दिलाती है। डॉक्टर पीयूष तिवारी का जीवन आज के दौर में यह संदेश देता है कि यदि इंसान का उद्देश्य निस्वार्थ हो तो वह अपने पेशे के माध्यम से समाज में वास्तविक परिवर्तन ला सकता है।











