मोतियाबिंद के आधुनिक ऑपरेशन की मशीन न होने से भटक रहे ग्रामीण मरीज; डॉक्टर ने व्यक्तिगत स्तर पर जुटाए उपकरण, सीमित साधनों में रच रहे सफलता का इतिहास
अब्दुल्ला अख़्तर
छिबरामऊ। दिलू नगला गांव स्थित सौ शैया अस्पताल का नेत्र रोग विभाग इन दिनों गंभीर प्रशासनिक उपेक्षा और बुनियादी चिकित्सा उपकरणों की कमी से जूझ रहा है। अस्पताल में योग्य एवं अनुभवी नेत्र रोग विशेषज्ञ की तैनाती होने के बावजूद बुनियादी ढाँचे और आधुनिक संसाधनों के अभाव में आँखों के मरीजों को सरकार द्वारा वादे के अनुसार सभी स्वास्थ्य सुविधाएं नहीं मिल पा रही हैं। स्थिति यह है कि कई महत्वपूर्ण जांचों और मोतियाबिंद के आधुनिक ऑपरेशनों के लिए मरीजों को विवश होकर अन्य निजी अस्पतालों या बड़े शहरों का रुख करना पड़ रहा है, जिससे गरीब और मध्यमवर्गीय ग्रामीण परिवारों पर भारी वित्तीय बोझ पड़ रहा है।
रोज़ाना इस प्रमुख सरकारी अस्पताल में दूर-दराज के दर्जनों गांवों से सैकड़ों मरीज अपनी आंखों के इलाज की उम्मीद लेकर पहुँचते हैं। अस्पताल प्रशासन द्वारा दावा तो बड़ी स्वास्थ्य सुविधाओं का किया जाता है, लेकिन धरातल पर नेत्र विभाग लंबे समय से जरूरी उपकरणों के लिए तरस रहा है।
अस्पताल के आधिकारिक सूत्रों के अनुसार, नेत्र विभाग में इस समय सबसे बड़ी समस्या ‘फैकोइमल्सिफिकेशन’ मशीन की अनुपलब्धता है। ज्ञात हो कि इस आधुनिक तकनीक के जरिए बिना टांके और बिना चीरे के मोतियाबिंद का सुरक्षित और त्वरित ऑपरेशन किया जाता है, जिससे मरीज को अगले ही दिन से साफ दिखने लगता है और रिकवरी बेहद तेज होती है। यह मशीन अस्पताल में उपलब्ध न होने के कारण मोतियाबिंद से पीड़ित बुजुर्ग मरीजों को सबसे अधिक परेशानी का सामना करना पड़ रहा है।
मशीन के अभाव में वर्तमान में आने वाले मरीजों का ऑपरेशन केवल पारंपरिक (एसआईसीएस) साधारण विधि से ही किया जा रहा है। जिन मरीजों को आधुनिक लेजर या टांका-रहित विधि से ही ऑपरेशन करवाना होता है, उन्हें मजबूरी में निजी डॉक्टरों की महंगी फीस चुकानी पड़ रही है। बुजुर्ग मरीजों को बार-बार अस्पताल आने-जाने में शारीरिक असुविधा के साथ-साथ भारी अतिरिक्त आर्थिक खर्च का भी सामना करना पड़ रहा है।
*डॉक्टर ने पेश की कर्तव्यनिष्ठा की अनूठी मिसाल*
सरकारी तंत्र की इस घोर सुस्ती और अभाव के बीच राहत की एकमात्र किरण अस्पताल में तैनात नेत्र रोग विशेषज्ञ डॉ. अविनाश गुप्ता बने हुए हैं। मरीजों की दैनिक असुविधा और लाचारी को देखते हुए उन्होंने हार मानने के बजाय एक अनूठी मिसाल पेश की है। डॉ. गुप्ता ने विभागीय लालफीताशाही का इंतजार किए बिना, अपने व्यक्तिगत स्तर और निजी खर्च पर कुछ बेहद जरूरी बुनियादी चिकित्सा उपकरण जुटाए हैं।
इन्हीं व्यक्तिगत रूप से प्रबंधित संसाधनों की मदद से वे अस्पताल आने वाले मरीजों की आँखों की मुकम्मल जांच कर रहे हैं और उन्हें हर संभव सटीक उपचार प्रदान कर रहे हैं, जिससे क्षेत्रीय ग्रामीण जनता को बहुत बड़ी राहत मिल रही है। स्थानीय निवासियों का कहना है कि यदि डॉक्टर साहब यह कदम न उठाते, तो सामान्य ओपीडी सेवाएं भी ठप हो जातीं।
संसाधनों की भारी कमी के बावजूद डॉ. अविनाश गुप्ता की कार्यशैली और मरीजों के प्रति समर्पण ने एक ऐतिहासिक रिकॉर्ड कायम किया है। सरकारी तंत्र से पूरा सहयोग न मिलने के बाद भी उन्होंने पारंपरिक विधि का ही बेहतरीन उपयोग करते हुए राष्ट्रीय अंधता निवारण कार्यक्रम के अंतर्गत कुल 345 सफल मोतियाबिंद ऑपरेशन किए हैं। इस उत्कृष्ट प्रदर्शन के साथ उन्होंने पूरे जनपद (जिले) में प्रथम स्थान प्राप्त किया है, जो उनकी बेजोड़ कार्यकुशलता और सेवा भावना का जीवंत प्रमाण है।
डॉ. सुनील कुमार सिंह, मुख्य चिकित्सा अधीक्षक (सीएमएस) ने कहा शासन को पत्र भेजकर अस्पताल के लिए आवश्यक आधुनिक मशीनों और नेत्र परीक्षण से जुड़े संसाधनों की डिमांड भेजी जा चुकी है। हम लगातार इसके लिए फॉलो-अप कर रहे हैं। फिलहाल अस्पताल में उपलब्ध पारंपरिक विधि (एसआईसीएस) से मोतियाबिंद पीड़ितों के ऑपरेशन की सुविधा सुचारू रूप से दी जा रही है ताकि ग्रामीण मरीजों को बिना इलाज के वापस न लौटना पड़े।











