अब्दुल्ला अख़्तर
गुरसहायगंज, कन्नौज। रमजान के मुकद्दस महीने के आगाज पर फर्रुखाबाद के पूर्व जिला पंचायत अध्यक्ष हाजी तहसीन सिद्दीकी ने रोजे की अहमियत और इसकी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि पर रोशनी डाली। उन्होंने बताया कि रोज़ा महज भूखा-प्यासा रहने का नाम नहीं, बल्कि यह अल्लाह की रजा हासिल करने और अपने गुनाहों से तौबा करने का एक बेहतरीन जरिया है।
हजरत आदम (अ.स.) से जुड़ी है रोजे की तारीख
तहसीन सिद्दीकी ने एक खूबसूरत मिसाल देते हुए बताया कि:
• दुनिया में सबसे पहला रोज़ा हजरत आदम अलैहिस्सलाम ने रखा था।
• जब उनसे खता हुई और उन्हें जन्नत से जमीन पर भेजा गया, तो उन्होंने लंबे समय तक अल्लाह से माफी मांगी।
• अल्लाह ने उनकी तौबा कबूल फरमाई और उन्हें रोज़ा रखने का हुक्म दिया।
• यही वजह है कि रोज़ा सब्र, तौबा और अल्लाह की तरफ पलटने का प्रतीक माना जाता है।
इबादत और समाज सेवा का महीना
उन्होंने जोर देते हुए कहा कि रमजान के इस पवित्र महीने में हर मुसलमान को इबादत में मशगूल रहना चाहिए। उन्होंने कुछ खास बातों पर जोर दिया:
1. गरीबों की मदद: इस महीने में दिल खोलकर जरूरतमंदों की इमदाद करनी चाहिए।
2. दुआओं की कबूलियत: सहरी और इफ्तार का वक्त वह नूरानी वक्त होता है जब अल्लाह अपने बंदे की हर जायज दुआ कबूल फरमाता है।
3. गुनाहों से तौबा: अल्लाह बहुत गफूर-उर-रहीम (माफ करने वाला) है, इसलिए रो-रो कर अपने गुनाहों की माफी मांगनी चाहिए।
“रोज़ा इबादतों में एक अज़ीम इबादत है। हमें इस पवित्र महीने का अदब और एहतराम पूरी शिद्दत के साथ करना चाहिए।” — हाजी तहसीन सिद्दीकी











