उत्तर प्रदेश के इटावा जिले की मिट्टी ने खेल जगत को कई सितारे दिए हैं और उन्हीं में से एक चमकता नाम सौरभ पाठक का है जिन्होंने क्रिकेट के मैदान पर अपनी एक विशिष्ट पहचान बनाई है। इटावा में जन्मे सौरभ पाठक की शैक्षणिक यात्रा गवर्नमेंट इंटर कॉलेज से शुरू हुई जहां उन्होंने 1991 में इंटरमीडिएट की परीक्षा उत्तीर्ण की और उसके बाद उच्च शिक्षा के लिए आगरा के प्रतिष्ठित सेंट जॉन्स कॉलेज से बीएससी, लखनऊ विश्वविद्यालय से एमए और कानपुर विश्वविद्यालय से प्राचीन इतिहास में एमए की डिग्रियां हासिल कीं। पढ़ाई के साथ-साथ क्रिकेट के प्रति उनका जुनून ऐसा था कि उन्होंने आगरा यूनिवर्सिटी की टीम में एक मुख्य गेंदबाज के तौर पर अपनी अहम भूमिका निभाई और अपनी रफ्तार से बल्लेबाजों को खूब छकाया।
सौरभ पाठक की गेंदबाजी का जलवा केवल विश्वविद्यालय तक ही सीमित नहीं रहा बल्कि उन्होंने दिल्ली, आगरा, गोरखपुर, कानपुर, लखनऊ और उरई जैसे बड़े शहरों की टीमों के लिए भी शानदार गेंदबाजी की। संघर्ष और मेहनत के इस दौर में उन्होंने साल 1999 से 2013 तक दिल्ली में नौकरी करने के साथ-साथ पेशेवर क्रिकेट खेलना भी जारी रखा जो खेल के प्रति उनके अटूट समर्पण को दर्शाता है। खिलाड़ी के रूप में एक लंबी पारी खेलने के बाद उनके जीवन में नया मोड़ तब आया जब यूपीसीए के डायरेक्टर श्याम बाबू ने उनकी प्रतिभा और खेल की समझ को देखते हुए उन्हें अंपायरिंग की जिम्मेदारी सौंपी।
आज सौरभ पाठक साल 2023 से एक पंजीकृत अंपायर के रूप में अपनी सेवाएं दे रहे हैं और वर्तमान में उत्तर प्रदेश राज्य के जूनियर व सीनियर वर्ग के साथ-साथ महिला एवं पुरुष क्रिकेट प्रतियोगिताओं में भी अंपायर की महत्वपूर्ण भूमिका में नजर आते हैं। अपनी इस सफलता का श्रेय वह कड़ी मेहनत और लगन को देते हैं क्योंकि उनका मानना है कि यदि पूरी गंभीरता के साथ काम किया जाए तो सफलता निश्चित रूप से मिलती है चाहे वह क्षेत्र शिक्षा का हो, चिकित्सा का हो या फिर खेल का। सौरभ पाठक की यह प्रेरक यात्रा आज के युवाओं को यह सीख देती है कि निरंतरता और अनुशासन के दम पर किसी भी क्षेत्र में शिखर तक पहुँचा जा सकता है।
आलेख
शिवम दुबे/मो इरफान











