इटावा जिला अस्पताल में जब कोई मरीज या तीमारदार मुख्य चिकित्सा अधीक्षक डॉ. परितोष शुक्ला से मिलता है, तो उसे किसी बड़े प्रशासनिक अधिकारी के बजाय एक आत्मीय और सरल व्यक्तित्व के दर्शन होते हैं। मेरठ की मिट्टी में पले-बढ़े डॉ. शुक्ला का पूरा जीवन इस बात का प्रमाण है कि यदि नींव संस्कारों की हो, तो पद का अहंकार व्यक्ति को छू भी नहीं पाता। चिकित्सा जगत में ऊँचाइयों को छूने के बावजूद उनकी जड़ें आज भी अपने माता-पिता द्वारा दी गई उन सीखों से जुड़ी हैं, जो उन्हें निस्वार्थ भाव से मानवता की सेवा करने के लिए प्रेरित करती हैं। उनके लिए चिकित्सा केवल एक पेशा नहीं, बल्कि वह संकल्प है जिसे उन्होंने वर्ष 2006 में सरकारी सेवा में कदम रखने के साथ ही आत्मसात कर लिया था।
डॉ. शुक्ला के कार्य करने का अंदाज और समय की पाबंदी उन्हें दूसरों से अलग बनाती है। वे सुबह 8:00 बजे से शाम 5:00 बजे तक पूरी तन्मयता के साथ अस्पताल की व्यवस्थाओं को दुरुस्त करने और मरीजों के हित के लिए समर्पित रहते हैं। उनके कुशल प्रबंधन और मृदुभाषी व्यवहार के कारण ही आज अस्पताल की कार्यप्रणाली में एक सकारात्मक बदलाव महसूस किया जा रहा है। वे बिना किसी भेदभाव के हर व्यक्ति की समस्या सुनते हैं, जो आज के समय में प्रशासनिक सेवा के क्षेत्र में एक दुर्लभ और प्रेरणादायी उदाहरण है।
हालिया संवाद में डॉ. शुक्ला के जीवन दर्शन की गहराई स्पष्ट रूप से दिखाई दी। उनका मानना है कि इंसान के पास चाहे कितनी भी सुख-सुविधाएं आ जाएं, लेकिन उसके संस्कारों की पूँजी ही समाज में उसकी वास्तविक पहचान बनाती है। डॉ. शुक्ला की यह कर्तव्यनिष्ठा और निष्पक्ष कार्यशैली न केवल मरीजों को राहत पहुँचा रही है, बल्कि युवा डॉक्टरों और प्रशासनिक अधिकारियों के लिए भी एक मार्गदर्शक का कार्य कर रही है। सचमुच, डॉ. परितोष शुक्ला जैसे व्यक्तित्व समाज में विश्वास और सेवा की उस मशाल को जलाए हुए हैं, जिसकी आज के दौर में सबसे अधिक आवश्यकता है।











