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April 20, 2026 8:23 pm

अलविदा जुमा पर इबादत के साथ इंसानियत और भाईचारे की दुआ करें: मुतवल्ली वसीम क़ुरैशी

अब्दुल्ला अख़्तर

छिबरामऊ: जामा मस्जिद के मुतवल्ली मोहम्मद वसीम क़ुरैशी ने रमज़ान-उल-मुबारक के समापन की ओर बढ़ते हुए ‘आखिरी अशरे’ और ‘अलविदा जुमा’ की रूहानी अहमियत पर विस्तार से रौशनी डाली। उन्होंने कहा कि यह वक्त अल्लाह की इबादत में खुद को पूरी तरह समर्पित करने का है।
मुतवल्ली वसीम क़ुरैशी बताया कि रमज़ान का तीसरा और आखिरी हिस्सा (अशरा) ‘जहन्नम से निजात’ (नरक से मुक्ति) का है। इसी अशरे में ‘शब-ए-कद्र’ जैसी मुकद्दस रात आती है, जो हज़ार महीनों की इबादत से अफजल है। उन्होंने मोमिनों से अपील की कि वे इन रातों में जागकर अल्लाह को राजी करें।
अलविदा जुमा और दुआ की कुबूलियत
‘अलविदा जुमा’ को लेकर उन्होंने कहा कि यह पूरे महीने की इबादतों का निचोड़ है। इस दिन मस्जिदें नमाजियों से गुलजार रहती हैं और हर दिल में रमज़ान के विदा होने का गम और अल्लाह की रहमत पाने की उम्मीद होती है। उन्होंने कहा कि जुमातुल विदा पर की गई दुआएं कभी खाली नहीं जातीं।
उन्होंने ज़ोर दिया कि ‘फित्रा’ और ‘जकात’ के जरिए गरीबों की मदद करना ही असल इबादत है, ताकि अलविदा जुमा और ईद की खुशियां हर घर तक पहुँच सकें।
उन्होंने बताया कि जामा मस्जिद में अलविदा जुमा की नमाज़ के लिए विशेष इंतज़ाम किए गए हैं, ताकि अकीदतमंद सुकून से इबादत कर सकें।

Mohammed irfan
Author: Mohammed irfan

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