अब्दुल्ला अख़्तर
छिबरामऊ : माह-ए-रमजान की आमद के साथ ही हर तरफ इबादत और रूहानियत का माहौल है। इसी सिलसिले में मशहूर शायर बेहतरीन आवाज़ और लहज़े के बानी कारी शुएब बलरामपुरी ने रमजान के पाक महीने और खासकर इसके ‘पहले अशरे’ (प्रथम 10 दिन) की फजीलतों पर रोशनी डाली। उन्होंने बताया कि यह महीना महज भूखे-प्यासे रहने का नाम नहीं, बल्कि अपनी रूह (आत्मा) को पाक-साफ करने और खुदा की कुर्बत हासिल करने का जरिया है।
1. रहमत का पहला अशरा
कारी शुएब ने जोर देते हुए कहा कि रमजान को तीन हिस्सों (अशरों) में बांटा गया है। पहला अशरा ‘रहमत’ का है।
• इलाही रहमत: इन शुरुआती दस दिनों में अल्लाह की रहमत अपने बंदों पर मूसलाधार बारिश की तरह बरसती है।
• तौबा का वक्त: जो बंदा इस अशरे में सच्चे दिल से दुआ करता है, अल्लाह उसे अपनी रहमत के साये में ले लेता है।
2. रोज़े की पाकीज़गी और रूहानियत
कारी साहब के मुताबिक, रोज़ा सिर्फ पेट का नहीं, बल्कि इंसान के हर वजूद का होना चाहिए:
• जुबान का रोज़ा: झूठ, गीबत (बुराई) और कड़वे बोल से परहेज करना।
• आंख और कान का रोज़ा: कुछ भी बुरा देखने या सुनने से बचना।
• नफ्स पर काबू: अपनी बुरी आदतों और गुस्से पर काबू पाना ही रोज़े की असली पाकीज़गी है।
3. तक़वा (परहेजगारी) का जरिया
उन्होंने कुरान का हवाला देते हुए बताया कि रोज़ा इसलिए फर्ज किया गया ताकि इंसान के अंदर ‘तक़वा’ पैदा हो। तक़वा का अर्थ है अल्लाह का खौफ और उसकी मोहब्बत में बुराइयों से खुद को बचाना। जब एक इंसान चिलचिलाती धूप में प्यास के बावजूद पानी नहीं पीता, तो वह असल में अपने सब्र और ईमान का इम्तिहान दे रहा होता है।
4. इबादत और सखावत (दान)
रमजान की पवित्रता इस बात में भी है कि हम दूसरों का ख्याल रखें। कारी शुएब ने कहा इस महीने में नेक काम का सवाब (पुण्य) कई गुना बढ़ जाता है, अपने इफ्तार और सेहरी में गरीबों को शामिल करना ही रमजान की रूह है।
रमजान का महीना हमें अनुशासन और हमदर्दी सिखाता है। यह वह वक्त है जब हम अपनी जरूरतों को कम करके दूसरों के दर्द को महसूस करना सीखते हैं।— कारी शुएब बलरामपुरी
कारी शुएब बलरामपुरी ने दुआ की कि अल्लाह तमाम मुसलमानों को इस महीने की मुकद्दस घड़ियों का एहतराम करने और मुकम्मल रोज़े रखने की तौफीक अता फरमाए। उन्होंने जोर दिया कि इस महीने की पाकीज़गी को बनाए रखने के लिए नमाज की पाबंदी और कुरान की तिलावत बेहद जरूरी है।
गौरतलब है कि कारी शुएब बलरामपुरी न सिर्फ अपनी बेहतरीन नज़्मों और शायरी के लिए मकबूल हैं, बल्कि उनकी आवाज का जादू और तिलावत-ए-कुरआन का निराला अंदाज सुनने वालों पर एक अलग ही कैफियत (असर) पैदा कर देता है। रमजान के इस पाक मौके पर उन्होंने अपनी इसी पुरकशिश आवाज में रोजे की फजीलतों को आम अवाम तक पहुँचाया।











