इटावा होली केवल रंगों का उत्सव नहीं, बल्कि आपसी प्रेम, सद्भावना और भाईचारे का वह पावन अवसर है जब हम ‘अपने-पराए’ का भेद मिटाकर एक-दूसरे को स्नेह के रंगों में सराबोर कर देते हैं। लाल, हरे, गुलाबी और पीले रंगों की फुहारें मन को उमंग से भर देती हैं, लेकिन इस उल्लास के बीच शालीनता और स्वास्थ्य का ध्यान रखना बेहद अनिवार्य है। अक्सर त्योहार के जोश में हम यह भूल जाते हैं कि बाजार में बिकने वाले मनभावन और चमकीले रंग असल में रसायनों का खतरनाक मिश्रण होते हैं। हुड़दंग और असुरक्षित रंगों का प्रयोग इस उत्सव की गरिमा को कम करने के साथ-साथ आपके शरीर को गंभीर क्षति पहुँचा सकता है।
डॉ. हरीशंकर पटेल (महामहिम राज्यपाल द्वारा सम्मानित समाजसेवी एवं राष्ट्रीय कार्यकारिणी सदस्य, अपना दल-एस) के अनुसार, सिंथेटिक रंगों में मौजूद तत्व किसी जहर से कम नहीं हैं। लाल रंग में मर्क्यूरी सल्फाइट होता है जो त्वचा के कैंसर का कारण बन सकता है, जबकि काले रंग का लेड ऑक्साइड गुर्दे की बीमारियों को न्यौता देता है। इसी प्रकार, नीले रंग का प्रूसिक एसिड चर्मरोग पैदा करता है और हरे रंग का कॉपर सल्फेट हमारी आंखों की रोशनी के लिए बेहद घातक है। सफेद रंग में मौजूद एल्युमिनियम ब्रोमाइड और बैंगनी रंग के हेवी मेटल ऑक्साइड हमारी हड्डियों, दिमाग और गुर्दे पर सीधा प्रहार करते हैं। इन घातक रसायनों से बचकर ही हम होली की खुशियों को सुरक्षित रख सकते हैं।
प्रकृति ने हमें उपहार स्वरूप ऐसे अनगिनत साधन दिए हैं, जिनसे हम घर पर ही सुरक्षित और गुणकारी रंग तैयार कर सकते हैं। प्राकृतिक रंगों की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि ये शरीर को नुकसान पहुँचाने के बजाय लाभ प्रदान करते हैं। आप टेसू और गेंदा के फूलों से मनमोहक पीला रंग बना सकते हैं, जबकि हरी मेहंदी के प्रयोग से सुंदर लाल और नारंगी रंग प्राप्त किया जा सकता है। चुकंदर और अंडी के तने से गहरा लाल या महावरी रंग तैयार होता है, वहीं हल्दी और चंदन का लेप न केवल जोगिया रंग देता है बल्कि त्वचा के लिए औषधि का काम भी करता है। आइए, इस बार रसायनों को त्यागकर प्रकृति के इन न्यारे रंगों के साथ शालीनतापूर्वक होली मनाएं और स्वास्थ्य व सौहार्द का संदेश फैलाएं।









