इटावा उत्तर प्रदेश के इटावा की पावन धरती पर जन्मे गुफरान अहमद का व्यक्तित्व सादगी, अनुशासन और अटूट कर्तव्यनिष्ठा का एक अद्भुत संगम है। उनके जीवन की कहानी उसी शिक्षण संस्थान से शुरू हुई जहाँ आज वे प्रधानाचार्य के रूप में अपनी गौरवशाली सेवाएँ दे रहे हैं। इस्लामिया इंटर कॉलेज, इटावा के पूर्व छात्र रहे गुफरान अहमद के लिए यह पद केवल एक जिम्मेदारी नहीं, बल्कि अपनी मातृसंस्था के प्रति एक ऋण चुकाने का अवसर है। उनके पिता, स्वर्गीय सुल्तान अहमद, जो स्वयं एक स्वास्थ्य अधिकारी के रूप में समाज की सेवा कर चुके थे, उनके जीवन के सबसे बड़े आदर्श रहे। पिता से मिले संस्कारों ने ही उन्हें स्वच्छता और जनसेवा के कठिन मार्ग पर अडिग रहने की प्रेरणा दी।
गुफरान अहमद का शैक्षणिक और खेल सफर बेहद प्रभावशाली रहा है। इस्लामिया इंटर कॉलेज से अपनी प्रारंभिक शिक्षा पूरी करने के बाद, उन्होंने उत्तर प्रदेश के प्रतिष्ठित अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय (AMU) से बी.कॉम और एम.कॉम की उच्च उपाधियाँ प्राप्त कीं। शिक्षा के साथ-साथ खेलों के प्रति उनका जुनून भी अनुकरणीय रहा है। वर्ष 1981-82 के दौरान वे हॉकी टीम के मंडल स्तरीय खिलाड़ी रहे, जिसने उनके व्यक्तित्व में टीम भावना और अनुशासन को और अधिक सुदृढ़ किया। यही कारण है कि आज वे शिक्षा के साथ-साथ शारीरिक विकास और खेलों को भी समान महत्व देते हैं।
एक शिक्षक और प्रधानाचार्य के रूप में उनकी पहचान विद्यालय की चारदीवारी के भीतर ही सीमित नहीं रही। प्रधानमंत्री के ‘स्वच्छ भारत अभियान’ को उन्होंने एक पवित्र मिशन की तरह अपनाया। उनके नेतृत्व में इस्लामिया इंटर कॉलेज के छात्रों ने गांव-गांव जाकर स्वच्छता का संदेश दिया और समाज को जागरूक किया। समाज के प्रति उनके इसी निस्वार्थ और उत्कृष्ट योगदान के लिए उन्हें उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और वरिष्ठ राजनेता उमा भारती द्वारा सम्मानित भी किया जा चुका है। वे दृढ़ता से मानते हैं कि जहाँ गंदगी होगी, वहाँ उनका स्वभाव स्वतः ही उन्हें सुधार की दिशा में ले जाता है; यह संस्कार उन्हें विरासत में मिला है।
गुफरान अहमद आज उस ऐतिहासिक संस्थान की विरासत को आगे बढ़ा रहे हैं, जिसने देश को पूर्व राष्ट्रपति डॉ. जाकिर हुसैन, ‘मुगल-ए-आजम’ के महान निर्देशक के. आसिफ, मशहूर शायर बशीर बदर व पूर्व हॉकी कप्तान देवेश सिंह चौहान जैसी कालजयी विभूतियाँ दी हैं। इस महान परंपरा को जीवित रखते हुए, वे वर्तमान पीढ़ी को गढ़ने की जिम्मेदारी बखूबी निभा रहे हैं। आज के डिजिटल युग में, वे छात्रों को मोबाइल की लत के प्रति निरंतर सचेत करते हैं। उनका मानना है कि मोबाइल शिक्षा की गहराई के लिए घातक हो सकता है और छात्रों को अपनी जिज्ञासाओं के समाधान के लिए समर्पित शिक्षकों और माता-पिता पर भरोसा करना चाहिए। वे स्वयं को एक सख्त प्रधानाचार्य के बजाय एक संवेदनशील अभिभावक के रूप में प्रस्तुत करते हैं। उनका कहना है कि जिस छात्र की बात कोई नहीं सुनता, उसकी बात सुनने के लिए गुफरान अहमद हमेशा तत्पर हैं। एक प्रधानाचार्य का यही वास्तविक दायित्व है कि वह न केवल शिक्षित करे, बल्कि हर बच्चे के उज्ज्वल भविष्य का सच्चा मार्गदर्शक बने।
आलेख
शिवम दुबे/मो इरफान









