इटावा: पुरविया टोला, इटावा की ऐतिहासिक होली का दृश्य देखने के लिए शहर भर के लोग उमड़ पड़ते हैं। यह होली न केवल अपने आकार और भव्यता के लिए प्रसिद्ध है, बल्कि इसकी सदियों पुरानी परंपराएं और सामाजिक सद्भाव भी इसे खास बनाते हैं। होली जलाने के समय सैकड़ों महिलाएं, नई बहुएं और बच्चे मौके पर इकट्ठा होते हैं, जबकि पुरुष गन्ने में चना, जौ और गुलरिया बांधकर होली के सात चक्कर लगाते हैं। यह परंपरा भक्त प्रह्लाद की कहानी से जुड़ी हुई है, जिसे लोग पीढ़ी दर पीढ़ी निभाते आ रहे हैं।
प्रमुख समाजसेवी और राष्ट्रीय कार्यकारिणी सदस्य, अपना दल (एस), डॉ० हरीशंकर पटेल ने बताया कि पुरविया टोला की होली शायद ही कहीं और इतनी बड़ी और भीड़ वाली होती हो। उन्होंने कहा, “सैकड़ों साल से यहां होली जलाने के समय कभी लड़ाई-झगड़ा नहीं हुआ। यहां के लोग आपस में खाड़ी बोली बोलते हैं, जो बाहरी लोगों को बेहद आकर्षक लगती है।
भक्त प्रह्लाद की कहानी और परंपरा
होली जलाने की इस परंपरा में गन्ने को भूनकर खाने और बच्चों को भक्त प्रह्लाद की कहानी सुनाने का रिवाज शामिल है। यह परंपरा सैकड़ों साल से चली आ रही है और आज भी इसे पूरी श्रद्धा के साथ निभाया जाता है। होली के सात चक्कर लगाने के बाद इसे जलाया जाता है, जो सामाजिक एकता और धार्मिक आस्था का प्रतीक है।
सामाजिक सद्भाव की मिसाल
पुरविया टोला की होली न केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक है, बल्कि यह सामाजिक सद्भाव की भी मिसाल पेश करती है। यहां के लोग आपस में खाड़ी बोली बोलते हैं, जो बाहरी लोगों को बेहद आकर्षक लगती है। डॉ० पटेल ने कहा, “यहां के लोगों की आपसी बातचीत और सद्भावना ही इस होली को और भी खास बनाती है।”
शहर भर के लोगों का उत्साह
होली के इस ऐतिहासिक आयोजन को देखने के लिए शहर भर के लोग पुरविया टोला पहुंचते हैं। महिलाएं, बच्चे और पुरुष सभी इस उत्सव में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते हैं। होली जलाने के बाद लोग एक-दूसरे को गुलाल लगाते हैं और मिठाइयां बांटते हैं। यह दृश्य देखने लायक होता है, जो सामाजिक एकता और सांस्कृतिक विरासत की झलक पेश करता है।
निष्कर्ष
पुरविया टोला की होली न केवल एक धार्मिक आयोजन है, बल्कि यह सामाजिक सद्भाव और सांस्कृतिक विरासत का जीवंत उदाहरण भी है। सैकड़ों साल से चली आ रही इस परंपरा को आज भी पूरी श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाया जाता है। डॉ० हरीशंकर पटेल के अनुसार, “यह होली न केवल पुरविया टोला, बल्कि पूरे इटावा की गौरवशाली परंपरा है।
स्थान: पुरविया टोला, इटावा









