Explore

Search

February 17, 2026 6:39 am

संत बाबा कासिम सुलेमानी के सामने मुगल बादशाह ने टेका था घुटना,नमाज के समय अपने आप खुल जाती थी बेड़ियां

मीरजापुर।उत्तर प्रदेश के मीरजापुर जिले के चुनार में स्थित संत बाबा कासिम सुलेमानी की दरगाह है।चुनार के पश्चिमी उत्तरी छोर पर गंगा की इठलाती लहरों के पास अकबर और जहांगीर के समकालीन चार सौ सालों से अधिक पुरानी संत बाबा कासिम सुलेमानी की दरगाह गंगा-जमुनी तहजीब बेमिसाल नमूना है।

 

हर साल होली के बाद लगातर पांच गुरूवार तक लगने वाले विख्यात चौती मेले में आसपास के दर्जनों जिलों और विभिन्न प्रदेशों से आने वाले जायरीन यहां आकर अपनी मन्नतों के लिए सजदा करते है।साथ ही बाबा की मजार पर चादर चढ़ाकर फातिहा पढ़कर बाबा के दरबार में अपनी अर्जी लगाते है।यहां का शांत वातावरण आकर्षण का केंद्र है। अगले पांच गुरुवार तक चलने वाले इस मेले में बड़ी संख्या में जायरीनों के पहुंचने की उम्मीद जताई जा रही है।

 

दरगाह के खलीफा सज्जादानशींन हाजी सैयद उर्ताउरहमान बताते हैं कि संत कासिम सुलेमानी का जन्म 1549 में पंजाब प्रांत के पेशावर में हुआ था।उनके बारे में कहा जाता है कि इनके पूर्वज भी संत थे इस लिए इंसानियत को धर्म मानने वाले संत कासिम सुलेमानी ने मात्र 27 साल की छोटी अवस्था में ही धर्म ज्ञान की प्राप्ति के लिए मक्का मदीना, येरूशलम आदि की यात्रा की थी।

 

हाजी सैयद उर्ताउरहमान बताते हैं कि गद्दी पर बैठने के बाद बादशाह जहांगीर ने जंजीर और तलवार के साथ अपना फरमान भेजा था कि बादशाह का हुक्म मानते हुए जंग करो या फिर मेरी कैद में चले जाओ।संत कासिम सुलेमानी ने जंग को दरकिनार कर इंसानियत के लिए कैद में रहने का रास्ता चुना।जंग से इंकार कर खुद की कैद स्वीकार कर ली,जिस पर बादशाह के हुक्म से कड़ी निगेहबानी के साथ 1015 हिजरी (सन 1606) को चुनार किले में संत कासिम सुलेमानी को कैद कर दिया गया।

 

हाजी सैयद उर्ताउरहमान बताते हैं कि कैद के कुछ दिन बाद बादशाह को उनके कारिंदों ने जहांगीर को जानकारी दी कि नमाज के समय उनकी जंजीर खुल जाती है।बाबा कासिम सुलेमानी कभी कारागार तो कभी बाहर नजर आते है,वह यहां वहां घूमते है,पहाड़ों की सैर करते है।यह सुनकर बादशाह को अपनी गलती का एहसास हुआ और उसने संत से माफी मांगते हुए उनको रिहा कर दिया और उनको दुर्ग के समीप जमीन भेंट स्वरूप दिया,जिस पर संत कासिम के मौत के बाद उनके स्वजनों ने एक भव्य दरगाह का निर्माण कराया।अंग्रेजी हुकुमत के दौरान यहां वाइसराय लार्ड कर्जन भी बाबा के दरबार में जा चुके है।

 

बता दें कि दरगाह का नक्काशी दरवाजा प्रस्तर कला का भव्य नमूना है।इस विशाल द्वार पर सभी स्थान पर नक्काशी है और मेहराब पर खूबसूरत झालरें बनी हुई है।संत बाबा कासिम सुलेमानी के मकबरे के गुम्बद की छत में जो चित्रकारी की गई है इसकी रंग सज्जा बहुत सुंदर है वह 400 से अधित साल बीतने के बाद भी खराब नहीं हुई हैं। इसके साथ ही यहां कासिम सुलेमानी और उनके बेटे की दरगाह है।

 

प्रचलित कथाओं के अनुसार माना जाता है कि किले के भैरो बुर्ज पर स्थित आलमगीरी मस्जिद पर नमाज के समय संत बाबा कासिम सुलेमानी की हथकड़ी खुद ब खुद खुल जाती थी। इसी भैरो बुर्ज से एक दिन बाबा कासिम ने एक तीर छोड़ा और अपने शिष्यों से कहा कि यह तीर जहां गिरे वहीं इन्हें दफन किया जाए। तीर पहले उस स्थान पर गिर रहा था जहां बस्ती थी तब बाबा कासिम ने कहा टुक और (अर्थात थोड़ा आगे) इतना कहते ही तीर और थोड़ा आगे जाकर गिरा और उसी स्थान पर बाद में आगे जाकर उनका भव्य मकबरा बना।कालांतर में तब से इस बस्ती को बाबा के टुक और शब्द की वाणी से इस बस्ती को टेकौ*संत बाबा कासिम सुलेमानी के सामने मुगल बादशाह ने टेका था घुटना,नमाज के समय अपने आप खुल जाती थी बेड़ियां*

 

 

मीरजापुर।उत्तर प्रदेश के मीरजापुर जिले के चुनार में स्थित संत बाबा कासिम सुलेमानी की दरगाह है।चुनार के पश्चिमी उत्तरी छोर पर गंगा की इठलाती लहरों के पास अकबर और जहांगीर के समकालीन चार सौ सालों से अधिक पुरानी संत बाबा कासिम सुलेमानी की दरगाह गंगा-जमुनी तहजीब बेमिसाल नमूना है।

 

हर साल होली के बाद लगातर पांच गुरूवार तक लगने वाले विख्यात चौती मेले में आसपास के दर्जनों जिलों और विभिन्न प्रदेशों से आने वाले जायरीन यहां आकर अपनी मन्नतों के लिए सजदा करते है।साथ ही बाबा की मजार पर चादर चढ़ाकर फातिहा पढ़कर बाबा के दरबार में अपनी अर्जी लगाते है।यहां का शांत वातावरण आकर्षण का केंद्र है। अगले पांच गुरुवार तक चलने वाले इस मेले में बड़ी संख्या में जायरीनों के पहुंचने की उम्मीद जताई जा रही है।

 

दरगाह के खलीफा सज्जादानशींन हाजी सैयद उर्ताउरहमान बताते हैं कि संत कासिम सुलेमानी का जन्म 1549 में पंजाब प्रांत के पेशावर में हुआ था।उनके बारे में कहा जाता है कि इनके पूर्वज भी संत थे इस लिए इंसानियत को धर्म मानने वाले संत कासिम सुलेमानी ने मात्र 27 साल की छोटी अवस्था में ही धर्म ज्ञान की प्राप्ति के लिए मक्का मदीना, येरूशलम आदि की यात्रा की थी।

 

हाजी सैयद उर्ताउरहमान बताते हैं कि गद्दी पर बैठने के बाद बादशाह जहांगीर ने जंजीर और तलवार के साथ अपना फरमान भेजा था कि बादशाह का हुक्म मानते हुए जंग करो या फिर मेरी कैद में चले जाओ।संत कासिम सुलेमानी ने जंग को दरकिनार कर इंसानियत के लिए कैद में रहने का रास्ता चुना।जंग से इंकार कर खुद की कैद स्वीकार कर ली,जिस पर बादशाह के हुक्म से कड़ी निगेहबानी के साथ 1015 हिजरी (सन 1606) को चुनार किले में संत कासिम सुलेमानी को कैद कर दिया गया।

 

हाजी सैयद उर्ताउरहमान बताते हैं कि कैद के कुछ दिन बाद बादशाह को उनके कारिंदों ने जहांगीर को जानकारी दी कि नमाज के समय उनकी जंजीर खुल जाती है।बाबा कासिम सुलेमानी कभी कारागार तो कभी बाहर नजर आते है,वह यहां वहां घूमते है,पहाड़ों की सैर करते है।यह सुनकर बादशाह को अपनी गलती का एहसास हुआ और उसने संत से माफी मांगते हुए उनको रिहा कर दिया और उनको दुर्ग के समीप जमीन भेंट स्वरूप दिया,जिस पर संत कासिम के मौत के बाद उनके स्वजनों ने एक भव्य दरगाह का निर्माण कराया।अंग्रेजी हुकुमत के दौरान यहां वाइसराय लार्ड कर्जन भी बाबा के दरबार में जा चुके है।

 

बता दें कि दरगाह का नक्काशी दरवाजा प्रस्तर कला का भव्य नमूना है।इस विशाल द्वार पर सभी स्थान पर नक्काशी है और मेहराब पर खूबसूरत झालरें बनी हुई है।संत बाबा कासिम सुलेमानी के मकबरे के गुम्बद की छत में जो चित्रकारी की गई है इसकी रंग सज्जा बहुत सुंदर है वह 400 से अधित साल बीतने के बाद भी खराब नहीं हुई हैं। इसके साथ ही यहां कासिम सुलेमानी और उनके बेटे की दरगाह है।

 

प्रचलित कथाओं के अनुसार माना जाता है कि किले के भैरो बुर्ज पर स्थित आलमगीरी मस्जिद पर नमाज के समय संत बाबा कासिम सुलेमानी की हथकड़ी खुद ब खुद खुल जाती थी। इसी भैरो बुर्ज से एक दिन बाबा कासिम ने एक तीर छोड़ा और अपने शिष्यों से कहा कि यह तीर जहां गिरे वहीं इन्हें दफन किया जाए। तीर पहले उस स्थान पर गिर रहा था जहां बस्ती थी तब बाबा कासिम ने कहा टुक और (अर्थात थोड़ा आगे) इतना कहते ही तीर और थोड़ा आगे जाकर गिरा और उसी स्थान पर बाद में आगे जाकर उनका भव्य मकबरा बना।कालांतर में तब से इस बस्ती को बाबा के टुक और शब्द की वाणी से इस बस्ती को टेकौर कहा जाने लगा।र कहा जाने लगा।

Mohammed irfan
Author: Mohammed irfan

Live Tv
विज्ञापन
लाइव क्रिकेट स्कोर